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Thursday, 2 December 2010

जीव की संरचना इस प्रकार की है .

जीव की संरचना इस प्रकार की है .

जीव की संरचना इस प्रकार की है .
जीव की संरचना इस प्रकार की है .
आकृति - तीन शरीर मुख्य है .
स्थूल शरीर - बाह्य शरीर , ये कृतिम है और खोल या आवरण मात्र है .
सूक्ष्म शरीर - ये आता जाता है . और भोग और इच्छाओं या अन्य बहुत
से प्रयोजनों के लिये आवरण धारण करता है .मत्यु के बाद यही जाता
है .
कारण शरीर - जिस कारण हेतु ये शरीर धारण हुआ है वो कारण बीज
में निहित है .
* इसके अतिरिक्त तीन शरीर और है पर वे योगियों के होते हैं . जीव
इन तीन श्रेणियों को पारकर ही उन्हें जान सकता है और वह योग अवस्था
कहलाती है .
स्थूल शरीर पाँच तत्वों का बना है . प्रथ्वी , जल , वायु , अग्नि , आकाश
शरीर में प्रथ्वी का अंश - त्वचा , हड्डी , नाङी , बाल , माँस हैं
जल का अंश - रक्त , वीर्य , पसीना , मूत्र , लार हैं
अग्नि का अंश - भूख , प्यास , आलस , नींद ,तेज हैं
वायु का अंश - चलना , बोलना , दौङना , फ़ैलाना , सिकोङना हैं
आकाश का अंश - काम , क्रोध , लोभ , मोह , भय , हैं
इनकी सहायक प्रकृतियां भी हैं तथा इस सम्बन्ध में ग्यानियों में मतभेद भी
हैं पर एक नजर देखने पर इन मुख्य प्रकृतियों में कोई दोष नजर नहीं आता है .
नाभि में जो चक्र है उसमें शरीर की सारी नाङियाँ गुथी हुयीं है . उसमें संयम
करने से शरीर के सारे व्यूह का ग्यान होता है .
वक्षस्थल में कछुए की आकार की नाङी है . यहाँ साधक का चित्त और शरीर
दोनों ही स्थिर हो जाते हैं .
कण्ठ में संयम करने से अपने स्वरूप को जान लेता है तथा भूख प्यास से रहित
हो जाता है .
जिह्वा के ऊपर जो कपाल में छिद्र गया है उसे ब्रह्माण्ड कहते हैं . उसमें संयम
करने से साधक संसार सागर से उठकर स्वर्ग लोक तक विचरने वाले सिद्धों
के दर्शन होते हैं क्योंकि ब्रह्माण्ड में वयान प्राण ( वायु ) विचरण करता है उससे
सूक्ष्मता और हल्कापन आ जाता है .
भगवान शंकर ने बताया कि जितनी योनियां एवं सूक्ष्म योनियां याने चौरासी
लाख उतने ही आसन है . उनमें चौरासी श्रेष्ठ है . चौरासी में दस श्रेष्ठ हैं .
दस में चार आसन मुख्य हैं .