Thursday, 2 December 2010

story 2 विश्व को जीतना सरल है ,मन को जीतना कठिन है

विश्व को जीतना सरल है ,मन को जीतना कठिन है

विश्व को जीतना सरल है ,मन को जीतना कठिन है
 
एक बार एक आदमी ने एक जिन्न को वश में कर लिया .
जिन्न प्रकट हो गया..और बोला कि आज से में तुम्हारा
गुलाम हूँ पर मेरी एक शर्त है..कि मुझे लगातार काम
करने की आदत है सो तुम्हें मुझे लगातार काम बताने
होंगे और जैसे ही तुमने काम बताना बंद किया मैं तुम्हें
मारकर खा जाऊँगा..उस आदमी ने खुशी खुशी मंजूर
कर लिया..उसने सोचा कि मेरे पास ढेरों काम हैं
और मुझे खूब ये फ़्री का नौकर मिला अब ये काम करेगा
और मैं आनंद से मौज करूँगा..वह जिन्न को काम
बताने लगा और जिन्न उन्हें चुटकियों में कर देता
था.वह आदमी बङा खुश हुआ..लेकिन उसकी खुशी थोङे
ही समय रह पायी..असल में जिन्न इतनी तेजी से
काम करता था कि काम खत्म होने लगे और धीरे धीरे
सब काम खत्म हो गये..अब तो उस आदमी को समझ
में न आये कि जिन्न को क्या काम बताये..आखिर में उसे
काम नहीं सूझा तो जिन्न उसे खाने को दौङा और वह
आदमी जान बचाकर भागा . जिन्न उसके पीछे पीछे
दौङने लगा..वह आदमी आकर एक साधु संत की
कुटिया में गिर पङा और कहने लगा कि महाराज
मुझे किसी तरह बचा लीजिये ..संत ने उसकी पूरी
बात सुनी और कहा कि बस इतनी सी बात है..फ़िर उन्होनें
कहा जैसा में कहूँ वैसा करना..तब तक जिन्न पास आ गया
था ..उस आदमी ने संत की बतायी युक्ति से कहा कि
हे जिन्न ये बांस जमीन में गढा हुआ है जब तक मैं
तुम्हें दूसरा काम न बताऊँ इस पर चङो और फ़िर उतरो
फ़िर चङो और फ़िर उतरो...जिन्न ऐसा ही करने लगा
और थोङी ही देर में व्याकुल हो गया उसने उस आदमी
से कहा कि अब मेरी कोई शर्त नहीं है..तुम जब काम बताओगे
मैं बो काम करूँगा पर ये आदेश वापस ले लो..
वास्तव में हमारे मन की ठीक यही स्थिति है..मन जिन्न की
तरह है..और जीव को कामों में उलझाकर मार रहा है
सतगुरु की बतायी युक्ति से ये वश में हो जाता है और तब
उल्टा हो जाता है ..अभी तक जो जीव मन के कहे अनुसार
नाच रहा था..अब मन उसका गुलाम होकर कार्य करता है
और जीव अपार आनंद का अनुभव करता है ..क्योंकि
वह सतगुरु की बतायी युक्ति से करोङो जन्मों की मन की
इस दासता से मुक्त हो जाता है..वास्तव में यह साधारण
कहानी नहीं है इसमें एक बेहद गूढ रहस्य छिपा है.यदि
ठीक से विचार करो तो..

संत - ये सबसे बड़ी शक्ति होती है

संत - ये सबसे बड़ी शक्ति होती है
आम तोर पर लोग साधू संतों आदि मैं अंतर नहीं कर पाते हैं । मैं इनके बारे मैं बता रहा हूँ ।
संत - ये सबसे बड़ी शक्ति होती है .इनसे ऊपर कोई शक्ति नहीं होती .संत शब्द सनत से बना है जिसका मतलव ही लगातार होता है .इनका केवल एक ही धर्म होता है सनातन धर्म .यानी संसार के किसी धर्म से इनको कोई मतलव नहीं होता है .इनका जन्म भी नहीं होता है ये प्रकट होते है । महत्वपूर्ण बात ये है की शास्त्रों वेदों से इनका कोई लेना देने नहीं होता है .इनके मत को संतमत कहते है .केवल परमात्मा का असली नाम यानी ढाई अक्षर का महामंत्र देकर ये जीवों का कल्याण करते है .आम पूजा नियम आदि से इनका कोई मतलब नहीं होता है ।
योगी -ये दुसरे नंबर पर होते है .इनकी साधनाएँ अनेकों प्रकार की होती है और योगियों के बहुत प्रकार होते है .कुछ योगियों को भगवान् भी कहा जाता है जैसे राम ,कृष्ण ,परुशराम ये ढेरों की संख्या मैं होते है .खास बात ये है के ये तीन लोक के दायरे मैं आते है और अविनाशी नहीं होते है यानी एक निर्धारित समय के बाद इनका रिटायर मेंट हो जाता है इनके अनेकों मंत्र अनेकों साधनाएँ होती है ।
महात्मा -ये तीसरे नंबर पर होते है .इनके भी अनेक प्रकार होते है इनकी भी अनेक प्रकार की साधनाएँ होती है उदाहरण के लिए कृष्ण को ,सूर्य को इन्द्र को भी महात्मा कहा जाता .दरअसल कोई आत्मा जब ऊंचाई को प्राप्त कर लेती है तो वो आत्मा से महात्मा हो जाती है फिर इनका रूपांतरण इनकी इच्छानुसार देवता आदि मैं हो जाता है । बहुत अच्छे कर्मों से भी देवता बना जा सकता है और इन्द्र आदि पदवी प्राप्त करके स्वर्ग आदि सुखों का भोग हजारों बरसों तक किया जा सकता है
सिद्ध -महात्मा से नीचे सिद्ध होते है कुण्डलिनी ज्ञान के माध्यम से ये सिद्धि प्राप्त कर लेते है और विभिन्न प्रकार के चमत्कार आदि दिखाकर ये वैभव भोगते है .इनकी सिद्धि का असर ख़त्म होते ही इनकी बेहद दुर्गति होती है.और बाद मैं नरक के अलावा इनका कोई स्थान नहीं होता है
एक बात और है संसार मैं सबसे अधिक प्रभावित लोग सिद्धों से ही होते है और उनके अधिक संपर्क मैं रहने बाले क्रियाओं मैं साथ देने वाले भी दुर्गति को प्राप्त होकर नरक मैं स्थान पाते हैं ।
बस इनसे नीचे कोई स्थान नहीं होता । संसारमैं जो लोग तमाम तरह के स्वांग रच कर विभिन्न पदवी आदि धारण कर लेते है उसका अलोकिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं होता है
इनमें पुजारी ,भिछुक ,शास्त्रग्य ,भागवत वक्ता , प्रवचन करता , विभिन्न मतों का अनुसरण करने वाले ,ज्योतिषी ,तांत्रिक ,सन्यासी ,आदि किसी भी प्रकार का आत्म कल्याण करने मैं सक्षम नहीं होते है । और न ही कथा कीर्तन भागवत आदि सुनने से आत्म कल्याण होता है और न ही मुक्ति होती है ।
वास्तव मैं कोई भी धर्म हो कोई भी पूजा हो किसी भी जाती या देश का इंसान हो कुण्डलिनी ज्ञान और मुक्ति के लिए सहज योग के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है । ध्यान रखे कुण्डलिनी ज्ञान से मुक्ति कभी नहीं होती है । हाँ आत्मा अति दुर्लभ महानता को भी इस ज्ञान से प्राप्त कर सकती है और मनुष्य शारीर के रहते हुए वह इन्द्र आदि देवता की पदवी प्राप्त कर सकती है
पर मुक्ति का ज्ञान कुण्डलिनी ज्ञान से अलग है

आत्म ज्ञान के तीन प्रमुख तत्व

आत्म ज्ञान के तीन प्रमुख तत्व

जब कोई साधक पूजा उपासना से थोडा ऊपर उठाकर विशिष्ट ज्ञान के दायरे मैं आ जाता है तब अलग अलग संतों और संसार मैं प्रचलित विभिन्न मतों से उसे ज्ञात होता है के जो पूजा अब तक वह करता रहा है उसका कोई खास लाभ नहीं है । तब ज्ञान बुद्धि से उसे पता चलता है के संसार मैं तीन तरह के मत प्रचलित है ।
पहला अद्वैत ज्ञान - इसका अर्थ है के वो परमात्मा एक ही है और इसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है सब तरफ वो ही वो है .वास्तव मैं ययः एक अकाट्य सत्य है पर इस सत्य को जान्ने वाला कोई विरला साधू ही होता है । अत्यंत दुर्लभ ये ज्ञान करोड़ों जन्मों की तपस्या के बाद मिलाता है इस ज्ञान को जानने वाले ६०० बरसों मैं गिने चुने संत ही थे जिनमें कबीर साहिब रैदास जी दादू जी पालतू जी मीराबाई रिहाई जी तुलसीदास जी
रामकृष्ण परमहंस आदि हुए हैं मैंने कहा के ये अत्यंत दुर्लभ ज्ञान है जब तक आप को इस ज्ञान का कोई संत नहीं मिलता आप इस ज्ञान की कल्पना भी नहीं कर सकते है ।
VAISE जिन लोगों की रूचि इस ज्ञान मैं है उन्हे मई बता दूँ के आप कबीर का अनुराग सागर कबीर का बीजक आदि पद लें आप को उसमें पूरे उत्तर मिल जायेंगे
वास्तव मैं कबीर का अनुराग सागर उन लोगो की आँखें खोलने के लिए पर्यत है जो मूर्ति पूजा को जाने क्या मानते है । १०० रूपये मूल्य की ये किताब आपके सोचने का तरीका बदल देगी और आप सब कुछ भूल कर किसी सच्चे संत की तलाश मैं निकल पड़ेंगे ।
दूसरा द्वैत ज्ञान है - इसका मतलब है के पुरुष और प्रकृति दो ही है । पुरुष अर्थात चेतन और प्रकृति अर्थात जड़ तत्व इसका सिधांत ये है के चेतन के होने से प्रकृति मैं क्रिया हो रही है । वास्तव मैं इस ज्ञान को जान्ने वाले भी दुर्लभ ही है क्योंकि इस ज्ञान को जान्ने वाला भी काल की पहुँच से ऊपर होता है क्योंकि ये सिद्धांत भी किसी देवी शक्ति या एनी शक्ति को नहीं मानता है फिर भी इसके संत अद्वैत के मुकाबले काफी अधिक होते है । जबकि ये संत आम आदमी को कभी शायद ही मिल पाए क्योंकि ये गुप्त साधना करना पसंद करते है और बहुत कम शिष्य बनाना पसंद करते है इसलिए ये ज्ञान भी दुर्लभ ज्ञान की SHRANI मैं AATA है ।
TEESARA ज्ञान TRAIT का है
पर्म्मात्मा प्रकृति और जीव इसी ज्ञान मैं बहुत सी पूजा पद्धिति आती है
वास्तव मैं मैंने इसके लिए एक परिभाषा की तरह शब्दों का इस्तेमाल किया है इसकी वजह से आपको इनका मतलब समझने मैं दिक्कत हो सकती है ।
जैसे के साधारण भाषा मैं तरत को भगवन माँ शक्ति और जीव कहा गया है
दुसरे ज्ञान मैं इसी पुरुष और प्रकृति से साड़ी स्रष्टि का उत्पन्न होना बताया गया है परन्तु उन्हें एक पहला आदमी पहली ओरत बताया गया है बिबले मैं इसको एडम और एव बताया गया है परन्तु वास्तव मैं सच कुछ और ही है
हम लोग जिस ज्ञान की साधना करते है वह अद्वैत की साधना है । इसे ही सहज योग कहा जाता है इसमें सतगुरु द्वारा ढाई अक्षर का महामंत्र दे कर (जगाकर ) महाशक्ति से उसी तरह से कनेक्शन जोड़ दिया जाता है जिस तरह आप अपने घर मैं खम्बे से बिजली का तार जोड़ लेते है ।

सहज योग क्या है

सहज योग क्या है

वास्तव मैं सहज योग को समझने के लिए हमें चार घड़ों के दृष्टान्त को समझना होगा । मान लीजिये बारिश हो रही है और उसमें चार घड़े रखे हें ।
उनमें एक घड़ा तो बिलकुल सीधा रखा है दूसरा घड़ा थोडा तिरछा रखा है तीसरा घड़ा उल्टा रखा है और चौथा घड़ा सीधा है परन्तु फूटा है तो इनमें बारिश का पानी किस्में जायेगा । सीढ़ी सी बात है के सही और सीधे रखे हुए घड़े मैं । इसी प्रकार प्रभु की कृपा निरंतर बरस रही है पर हम घड़ों की तरह स्वभाव वालें हैं ।
कोई स्वभाव से तिरछा है तो उसे कृपा का थोडा ही अनुभव होता है ।
कोई उल्टा स्वभाव का है तो उसे बात समझ ही नहीं आती है ।
कोई फूटे घड़े के सामान है वो बात समझता तो है पर बात को अपने
रोक नहीं पाटा है ।
जो सीधा घड़े के सामान है वो बात को ग्रहण करता है और उसका लाभ भी उठता है और मुक्ति पाने का अधिकारी भी होता है । वास्तव मैं सीधे घड़े से मतलव है के आत्म ज्ञान का महत्व समझ मैं आते ही सतगुरु के सामने समपर्ण हो जाना ।
शिष्य के समपर्ण होते ही उसे अलोकिक रहस्य्य समझ मैं आने लगते हैं लेकिन ये जब सतगुरु से तुम्हारा मिलना हो जय तभी संभव है । यहाँ मैं एक बात बता दूँ हरेक कोई सतगुरु नहीं होता ।
सतगुरु वाही है जो तुम्हारी आत्मा को प्रकाशित कर दें या तुम्हारा तीसरा नेत्र खोल दें य्यादी तुम्हें गुरु की शरण मैं आये हुए तीन महीने से अधिक हो गए और तुम बताये हुए तरीके से साधना भी कर रहे हो और तुम्हें कोई अनुभव नहीं हुआ तो तुम सतगुरु तो क्या किसी गुरु की शरण मैं भी नहीं हो । धर्म्ग्रिन्ठो मई इस बात को स्पष्ट कहा गया है के कलियुग मैं झूतेहें गुरुओं का बेहद बोलबाला होगा और जनता इनकी झूठी बातों मैं उलझ कर रह जाएगी । इसलिए यदि आपका गुरु सच्चा है तो अधिक से अधिक आपको तीन महीने मैं अलोकिक अनुभव होने लगंगे । मैं ऐसे साधको को जनता हूँ जिन्हें ११ दिनों मैं अनेक अनुभव हुए और वो भली प्रकार साधना करने लगे वास्तव मैं सहज योग उसी तरह से है जैसे आप बिजली के तार से कबले अपने घर मैं जोड़तें है और लाइट जलने लगती है .

ज्ञान मार्ग की चार प्रमुख गतियाँ

ज्ञान मार्ग की चार प्रमुख गतियाँ

वैसे तो ज्ञान मार्ग की अनेक गतियाँ हैं । परन्तु सुविधा के लिहाज से हम इन्हें चार प्रमुख भागों मैं बाँट सकते हैं । यहाँ ये बताना जरूरी है के मन और शारीर के अतिरिक्त जो अनुभव किसी ज्ञान द्वारा किये जाते है उन्हें अलोकिक ज्ञान कहते हैं । मन और शारीर से किया जाने वाला ज्ञान कर्म की श्रेणी मैं आता हैं .त्तुम्हारा कर्म ही तुम्हें अगले जन्मों मैं ले जाता है और जैसा कर्म होता है उसी आधार पर अगला जन्म होता है
यहाँ ये बताना जरूरी है के आपका कर्म कितना ही अछ्छा क्यों न हो दुबारा मनुष्य जन्म ८४ लाख योनियों को भोगने के बाद ही प्राप्त होगा । आखिर इस मनुष्य शारीर मैं कुछ तो खास बात है जो देवता भी चाहते है के एक बार उन्हें ये मनुष्य शारीर मिल जय तो वे अखंड आनंद देने वाली मुक्ति को प्राप्त हो सकें ।
श्रीकृष्ण ने गीता मैं कहा है के हे अर्जुन मुक्ति ज्ञान से है अछ्छे कर्मों से मुक्ति कभी नहीं होती ।
अछ्छे कार्मों से तुझ्र स्वर्ग तो प्राप्त हो सकता है पर मुक्ति कभी प्राप्त नहीं होगी । जाहिर है ये मुक्ति बड़ी ऊंची चीज है .और मुक्ति के सामने स्वर्ग एकदम तुच्छ है
इस लिए ज्ञान मार्ग को चार भागों मैं बांटा ग्या है
१_विहंगम मार्ग २_मकर मार्ग ३_मरकत मार्ग ४_मीन मार्ग
इनमें विहंगम मार्ग ही संत मार्ग होता है बाकि सब सिध्धों के मार्ग हैं । इसे ही सहज योग कहते है ।

कर्मों की गति और आत्मा

कर्मों की गति और आत्मा

 
भगवन श्रीकृष्ण अर्जुन को पूरा सृष्टि ज्ञान बताते रहे पर जब अर्जुन ने कर्तव्य आदि के वारे मैं प्रश्न किया तो श्रीकृष्ण जैसा ज्ञानी भी ठिठक गया श्रीकृष्ण ने कहा की है अर्जुन ये कर्मों की गति वेहद कठिन है .सामान्य तौर पर इसको आजतक कोई समझ नहीं सका है ।
वास्तव मैं ये आत्मा न तो कुछ करता है और न ही कहीं आता जाता है फिर ये बड़े आश्चर्य की बात है के ये जीव रूप मैं कितने दुःख भोग रहा है । वास्तविक बात ये है के ये आत्मा अपने स्वरुप को भूल गया है और अपने आप को जीव मान बैठा है । जबकि सच बात ये है के आत्मा बहुत ऊंची चीज है ।
संत तुलसीदास ने कहा है
इश्वर अंश जीव अविनाशी , चेतन अमल सहज सुखराशी
वास्तव मैं ये आत्मा परमात्मा का ही अंश है । पर इसमें मैं उत्पन्न हो जाने के कारन ये सुख को छोड़कर घोर दुखों मैं आकर फँस गया ।
संत कभी न जन्म लेते है और न ही मरते है । वो सिर्फ जीव को इस मृत्य्लोक से निकलकर उसका वास्तविक परिचय बताते हैं और उसे सुखधाम तक जो की इस आत्मा का असली घर है जाने का तरीका और मार्ग बताते हैं ।
संतों का आगमन इसी हतु इस प्रथ्वीलोक पर होता है वर्ना तो वे अविनाशी लोक के निवासी हैं ।
जब अमरलोक से बिछड़ा जीव घोर दुखों और संकटों मैं प्रभु को याद करता है तो प्रभु उसको इन दुखों से मुक्त करने के लिए संत आत्माओं को इस लोक मैं भेजते है संत दुखी जीवों को दुःख से छुटकारा पाने का उपाय बताते हैं और हमेशा के आनंद का यानि मुक्ति का मार्ग भी बताते हैं । जिसे सहज योग के नाम से जाना जाता है
वास्तव मैं सहज योग न तो कुंडली जागरण को कहते हैं और न ही अस्तान्ग्योग और न ही प्रान्हायाम को और न ही किसी प्रकार के मेडिटेशन ध्यान को सहज योग कहते है और याद रखने योग्य बात ये है के सहजयोग के बिना मुक्ति हो ही नहीं सकती है
इसका एक ही मत है और एक ही नाम है जिसे संतमत के नाम से और सहज योग के नाम से जानते हैं । वास्तव मैं ये ज्ञान गूढ़ है और हजारों बर्षों मैं प्रकट होता है और इसे सिर्फ संतों की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है

story-1-लिया हुआ देना होगा

लिया हुआ देना होगा

एक समय की बात है एक आदमी जिंदगी मैं पहली बार किसी महात्मा का सत्संग सुनने गया । वहां जाकर उसने सुना के हमें इस जीवन मैं जो मिला है वो हमारे पूर्व जन्मों के पुन्य से मिला है और केवल अपने परिवार के लिए ही सोचना परमार्थ नहीं स्वार्थ है ।
अर्थात अगर वह इस जीवन की तरह ही अगले जन्मों मैं होना चाहता है तो उसे परमार्थ के कार्य करने ही होंगे अन्यथा जब उसने बोया ही नहीं तो वो कटेगा कैसे ।
उस आदमी के दिमाग मैं यह बात बैठ गई । वो अगले जन्म मैं भी धन का सुख प्राप्त करना चाहता था क्योंकि उसका ये मन्ना था की धन से सुख पूर्वक रहा जा सकता है और धन बहुत सी समस्यायों का समाधान भी है ।
उसने अपने घर आकर ये घोषणा कर दी के जिसको भी अगले जन्म के लिए पैसा चाहिए वो मुझसे ले जय अर्थात कोई भी मुझसे इस जन्म मैं पैसा ले ले और अगले जन्म मैं लोटा दे जो इस शर्त पर तैयार हो वो पैसा ले जा सकता है ।
उसकी ये घोषणा सुनकर चार दोस्तों ने सोचा के चलो ये खूब पागल मिला है । जो इस जन्म मैं रुपया देगा और अगले जन्म मैं लेगा ये रूपया तो खूब फ्री मैं मिला समझो अरे अगले जन्म मैं पता नहीं ये कहाँ होगा हम कहाँ होगे ये हमें कैसे हमें पहचानेगा और फिर पता नहीं अगला जन्म होता भी है या नहीं ।
यही सोचकर वो ५०-५० ००० रूपये चारों ले आये के चलो ये खूब पागल मिला । उस आदमी ने उन चारों से कागज पर लिखवा लिया के वो ये रूपया अगले जन्म मैं देंगे । वो खूब ख़ुशी मनाते हुए आ रहे थे के तभी प्रभु की कृपा से एक लीला हुई ।
वो रात मैं जहाँ ठहरे थे वहां एक कोल्हू चलने वाले का घर था । रात का समय था जब उनको ये विलक्षण लीला दिखाई दी । उस टैली के घर एक भैंसा और एक वेळ था व्वो दोनों आपस मैं बाते कर रहे थे । प्रभु की लीला से उनको वे बातें यानि जन्बरों की बोली समझ मैं आने लगी । भंसा कह रहा था के इस तेली के मुझ पर दो चक्कर का ऋण और बचा है जैसे ही दो चक्कर पूरे होंगे मेरी मृत्यु हो जाएगी और मेरा ऋण ख़त्म हो जायेगा
वेळ ने कहा तुम्हारी मुक्ति तो हो जाएगी पर मेरे ऊपर तो इसके ५० ०००
रुपये निकलते है जब तक वो पूरे नहीं हो जाते मुझे इसका काम
करना ही होगा फिर कुछ सोचकर वेळ बोला के एक उपाय और भी है वो यदि हो जाय तो ;यहाँ के राजा के हाथी के ऊपर मेरे ५० ००० रूपये है वो किसी प्रकार इसे मिल जाय तो मेरा ऋण भी चुक जाएगा
भैसा बोला कल राजा एक आयोजन करवाता है जिसमें कोई भी अपने किसी जानवर से यदि राजा के हाथी को मैदान छोड़कर भागने पर मजबूर कर दे तो राजा उसे इनाम मैं ५० ००० रूपये देता है यदि तुम किसी तरह राजा के हाथी को भयभीत कर दो और इस तेली को वो ५० ००० रूपये मिल जाए तो तुम्हारी भी मुक्ति हो जायेगी ।
वेळ को ये बात जाँच गई और वो भगवान् से प्रार्थना करने लगा के मेरे मालिक को इस बात की प्रेरणा हो के वो कल के मुकाबले के लिए मुझे ले जाए ।चारों दोस्त ये बात सुनकर चकित रह गए और वे बेहद भयभीत भी हो गए । उन्होंने इस बात की सच्चाई ज्जान्ने के लिए दूसरे दिन रूकने का निश्चय किया । के भैसा और वेळ की बातों का प्रमाण देखेंगे
दूसरे दिन जैसे ही भैसा के दो चक्कर पूरे हुए वो जमीन पर गिर पड़ा और मर गया । उधर तेली ने सोचा के मेरा भैसा मर गया है अब मुझे क्या करना चाहिए मुझे रुपयों की बहुत जरूरत है तभी उसके दिमाग मैं आया के यदि मैं अपने वेळ को राजा के हाथी से लडवा दूँ तो मेरी ये समस्या हल हो सकती है । ५० ००० रूपये से मेरे अनेकों काम हो जायेंगे यही सोचकर उसने हाथी से मुकाबले मैं अपने वेळ को लडवा दिया ।
अपनी मुक्ति का ख्याल रखकर वेळ पूरी ताकत से हाथी की तरफ बेहद गुस्से मैं दौड़ा हाथी उसका गुस्सा देखकर भोचक्का रह गया और दर कर भाग गया ।
तेली को ५० ००० रुपये मिलते ही व्वल का कर्ज उतर गया और वो भी गिरकर मर गया । अब तो उन चारों दोस्तों के छक्के छूट गए । लिया हुआ इस तरह चुकाना पड़ता है इसकी तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी । वो उलटे पाँव धनि आदमी के पास पहुंचे और कहने लगे के अपना रूपया वापस ले लो हमें नहीं चाहिए ।
लेकिन वो धनि आदमी अड़ गया के मुझसे तो तुम्हारी अगले जन्म की बात तय हुई है इसलिए रुपया मैं अगले जन्म मैं ही लूँगा । चरों दोस्त पछताने लगे के अब क्या करे ।
इसका रुपया न जाने हमें किस तरह अदा करना पड़े । फिर कुछ सोचकर उन्होंने उसीके
गाव मैं एक तालाव बनवा दिया उस सुन्दर तालाब के चारों और उन्होंने सुन्दर सी वाटिका का निर्माण कराया और कर्ज के दो लाख रूपये पूरे खर्च कर दिए लेकिन इसके बाद वो एक एक डंडा लेकर चारों तरफ घूमने लगे वो किसी आदमी को तो दूर किसी पशु पक्षी तक को पानी नहीं पीने देते और न ही किसी को बाग़ मैं घुसने देते ।
उनकी चर्चा चारों और फेल गई और उस दानी आदमी के कानो तक भी पहुंची के चार आदमी एक सुन्दर बाग़ के मालिक हैं पर न तो वो बाग़ मैं किसी को घुसने देते हैं और न ही किसी को पानी तक पीने देते है
वो आदमी भी उनके पास गया तो वो वाही चारों थे जिन्होंने उससे कर्जा लिया था उसने कहा के भाई तुम लोंगो को पानी क्यों नहीं पीने देते हो । ये सुनकर वो चरों वोले के हम एक शर्त पर तुम्हारी बात मान सकते है के तुम ये बात मान लो के ये बाग़ तुम्हारा हुआ और हमारा कर्जा चुक गया । फिर कोई भी इसका इस्तेमाल करे । थोड़ी नानुकर के बाद वो आदमी मान गया और वे कर्जे से मुक्त हो गए ।